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सीमा विवाद पर नेपाल के प्रधानमंत्री का बड़ा बयान, भारत के साथ संवाद के जरिए समाधान की जताई उम्मीद

नेपाल के प्रधानमंत्री Balendra Shah ने पदभार संभालने के बाद संसद में अपने पहले संबोधन के दौरान भारत के साथ लंबित सीमा विवादों को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने की प्रतिबद्धता जताई। उन्होंने कहा कि नेपाल सरकार विवादित मुद्दों के समाधान के लिए संवाद, कूटनीति और आपसी समझ को प्राथमिकता देगी।

संसद को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि पड़ोसी देशों के साथ मजबूत और सौहार्दपूर्ण संबंध नेपाल की विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत के साथ मौजूद सीमा संबंधी मतभेदों का समाधान बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों के माध्यम से तलाशा जाएगा।

विवादित क्षेत्रों पर कायम है नेपाल का दावा

प्रधानमंत्री ने पश्चिमी सीमा से जुड़े लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा क्षेत्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि नेपाल अपने दावों को शांतिपूर्ण और कूटनीतिक माध्यमों से आगे बढ़ाएगा। उन्होंने संकेत दिया कि ऐतिहासिक दस्तावेजों और सीमा निर्धारण से जुड़े मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी स्थिति स्पष्ट की जाएगी।

नेपाल सरकार का कहना है कि इन क्षेत्रों से जुड़े विवाद ऐतिहासिक परिस्थितियों और पुराने सीमा समझौतों की अलग-अलग व्याख्याओं से उत्पन्न हुए हैं। ऐसे में स्थायी समाधान के लिए दोनों देशों के बीच निरंतर संवाद आवश्यक है।

भारत के साथ रिश्तों को मजबूत करने पर जोर

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि नेपाल भारत के साथ मित्रतापूर्ण संबंधों को और मजबूत करना चाहता है। उन्होंने आर्थिक सहयोग, व्यापार, संपर्क परियोजनाओं और लोगों के बीच रिश्तों को दोनों देशों की साझेदारी का आधार बताया।

उनका कहना था कि संवेदनशील मुद्दों पर टकराव के बजाय आपसी सम्मान और रचनात्मक वार्ता का रास्ता अपनाना दोनों देशों के हित में होगा। नेपाल सरकार क्षेत्रीय स्थिरता और पड़ोसी सहयोग को प्राथमिकता देने के अपने रुख पर कायम रहेगी।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जुड़ा है विवाद

भारत और Nepal के बीच लगभग 1,751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है, जो दोनों देशों के बीच गहरे सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक संबंधों का आधार है। हालांकि कुछ सीमावर्ती क्षेत्रों को लेकर लंबे समय से मतभेद बने हुए हैं।

विशेष रूप से कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख क्षेत्र पश्चिमी सीमा पर विवाद के केंद्र में रहे हैं, जबकि सुस्ता क्षेत्र को लेकर भी दोनों देशों के बीच अलग-अलग दावे मौजूद हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इन विवादों की जड़ें 1816 में हुए Treaty of Sugauli की विभिन्न व्याख्याओं से जुड़ी हैं।

शांतिपूर्ण समाधान की उम्मीद

विश्लेषकों का मानना है कि नेपाल सरकार की ओर से बातचीत और कूटनीति पर दिया गया जोर दोनों देशों के बीच विश्वास बढ़ाने की दिशा में सकारात्मक संकेत माना जा सकता है। भारत और नेपाल के ऐतिहासिक संबंधों को देखते हुए सीमा विवादों का समाधान संवाद और सहयोग के माध्यम से तलाशने की संभावना अधिक मजबूत मानी जा रही है।

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