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लखनऊ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: उपभोक्ता आयोग के आदेशों के खिलाफ रिट तभी स्वीकार होगी, जब मौलिक अधिकार या प्राकृतिक न्याय का हनन हो

लखनऊ खंडपीठ ने उपभोक्ता आयोगों के फैसलों के खिलाफ दायर रिट याचिकाओं पर अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि ऐसे आदेशों को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत तभी चुनौती दी जा सकेगी, जब उनमें मौलिक अधिकारों का उल्लंघन या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का हनन दिखाई दे।

यह निर्णय उस याचिका को खारिज करते हुए दिया गया, जिसमें जिला, राज्य और राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोगों के आदेशों को चुनौती दी गई थी। मामला एक आवासीय परियोजना ‘साहू सिटी फेज-टू’ से जुड़ा था, जिसे 2012 में शुरू किया गया था। कई लोगों ने यहां प्लॉट बुक किए, लेकिन 2013 में गांव में चकबंदी शुरू होने के कारण कंपनी जमीन पर कब्जा देने में असफल रही।

तीन उपभोक्ताओं ने इस पर जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज की, जहां कंपनी को बुकिंग राशि 9 प्रतिशत ब्याज के साथ लौटाने का आदेश दिया गया। इसके बाद उपभोक्ताओं और कंपनी की ओर से अपीलें दायर हुईं, लेकिन राज्य आयोग ने उपभोक्ताओं के पक्ष में निर्णय देते हुए कंपनी की अपील खारिज कर दी। बाद में राष्ट्रीय आयोग ने भी कंपनी की पुनरीक्षण याचिका अस्वीकार कर दी।

कंपनी का कहना था कि बाद में तहसील प्रशासन ने उसे डिमांड नोटिस भेजा और बैंक खाते भी अटैच कर दिए, जिसके खिलाफ उसने हाईकोर्ट की शरण ली।

न्यायालय ने टिप्पणी की कि कंपनी अब तक उपभोक्ताओं को कब्जा प्रदान नहीं कर पाई है। साथ ही यह भी कहा कि कंपनी को चकबंदी की जानकारी पहले से थी या नहीं—यह तथ्यात्मक प्रश्न है, जिसका निर्धारण रिट याचिका के दायरे में नहीं किया जा सकता।

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