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मदरसों में वंदे मातरम को अनिवार्य बनाने के आदेश का AIMPLB ने किया विरोध, बताया धार्मिक अधिकारों के खिलाफ

पश्चिम बंगाल में मान्यता प्राप्त मदरसों में सुबह की प्रार्थना के दौरान राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ का अनिवार्य गायन कराने के निर्णय को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। इस मुद्दे पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने कड़ा विरोध जताते हुए राज्य सरकार से इस आदेश को वापस लेने की मांग की है।

बोर्ड का कहना है कि किसी भी छात्र या नागरिक को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी विशेष गीत, समारोह या गतिविधि में शामिल होने के लिए बाध्य करना संवैधानिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।

AIMPLB के प्रवक्ता सैयद कासिम रसूल इलियास ने कहा कि इस विषय पर सर्वोच्च न्यायालय पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि किसी व्यक्ति को राष्ट्रीय या धार्मिक कार्यक्रमों में जबरन भाग लेने के लिए विवश नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि इस संबंध में जारी निर्देश न्यायालय के पूर्व फैसलों की भावना के विपरीत प्रतीत होता है।

बोर्ड के अनुसार, ‘वंदे मातरम’ के कुछ हिस्सों को लेकर मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग की धार्मिक आपत्तियां रही हैं। उनका मानना है कि इन अंशों की कुछ अभिव्यक्तियां इस्लाम के एकेश्वरवाद संबंधी सिद्धांतों से मेल नहीं खातीं। ऐसे में छात्रों को इसे अनिवार्य रूप से गाने के लिए कहना उनकी धार्मिक मान्यताओं को प्रभावित कर सकता है।

AIMPLB ने यह भी कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, जहां सभी समुदायों की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता का सम्मान किया जाना चाहिए। बोर्ड का मानना है कि किसी एक समुदाय की सांस्कृतिक परंपराओं को दूसरे समुदाय पर थोपना उचित नहीं है।

फिलहाल इस मुद्दे पर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस तेज हो गई है। समर्थक इसे राष्ट्रभक्ति से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि विरोध करने वाले इसे व्यक्तिगत और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा विषय बता रहे हैं। आने वाले दिनों में इस मामले पर और चर्चा होने की संभावना है।

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