Breaking News

कलेक्ट्रेट मस्जिद मामले में बढ़ी कानूनी लड़ाई, हटाने के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देगा मुस्लिम पक्ष; इमरान मसूद का सरकार पर निशाना

सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद से जुड़े विवाद में नगर मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा 30 दिन के भीतर कथित अतिक्रमण हटाने के आदेश के बाद मामला राजनीतिक और कानूनी रूप से चर्चा में आ गया है। फैसले के बाद कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कहा कि इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी जाएगी और मस्जिद से जुड़े सभी दस्तावेज अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए जाएंगे।

इमरान मसूद ने कहा कि किसी भी संपत्ति का स्वामित्व केवल राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि प्रशासन को पहले संबंधित भूमि के स्वामित्व से जुड़े सभी आधिकारिक दस्तावेज सार्वजनिक करने चाहिए। उन्होंने दावा किया कि मस्जिद का अस्तित्व एक सदी से अधिक पुराना है और इसके समर्थन में पुराने बिजली कनेक्शन सहित अन्य ऐतिहासिक रिकॉर्ड उपलब्ध हैं।

बुलडोजर कार्रवाई को लेकर उन्होंने कहा कि यदि किसी भूमि विवाद में केवल राजस्व अभिलेखों के आधार पर कार्रवाई की जाएगी, तो भविष्य में अन्य धार्मिक स्थलों पर भी ऐसे सवाल उठ सकते हैं। उन्होंने मामले का समाधान कानूनी प्रक्रिया के तहत किए जाने पर जोर दिया।

दरअसल, नगर मजिस्ट्रेट अदालत ने 315 वर्गमीटर भूमि पर बने मस्जिद के हिस्से को सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा मानते हुए 30 दिन के भीतर हटाने का आदेश दिया है। अदालत ने संबंधित पक्ष को लगभग 6.41 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति जमा कराने का भी निर्देश दिया है। आदेश का पालन नहीं होने की स्थिति में प्रशासन को नियमानुसार कार्रवाई करने की अनुमति दी गई है।

मस्जिद प्रबंधन ने इस फैसले पर आपत्ति जताते हुए इसे एकपक्षीय बताया है। मस्जिद के मुतवल्ली तनवीर अहमद का कहना है कि सुनवाई के दौरान प्रस्तुत किए गए ऐतिहासिक दस्तावेजों और अन्य रिकॉर्ड को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। उनका दावा है कि मस्जिद का निर्माण आजादी से पहले का है और इससे जुड़े कई पुराने दस्तावेज उनके पास मौजूद हैं।

मस्जिद पक्ष के अधिवक्ता परवेज जब्बार ने कहा कि संबंधित भूमि वक्फ संपत्ति है तथा मस्जिद का पंजीकरण वर्ष 1956 से सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड में दर्ज है। उनके अनुसार, अदालत के आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी जाएगी।

वहीं सरकार की ओर से अदालत में कहा गया कि विवादित भूमि राजस्व अभिलेखों में कलेक्ट्रेट परिसर के रूप में दर्ज सरकारी संपत्ति है। प्रशासन का आरोप है कि परिसर के कुछ हिस्सों का धार्मिक उपयोग किया जा रहा था, जबकि कुछ कमरों को किराए पर देकर आय अर्जित की जा रही थी। साथ ही सुरक्षा कारणों का भी हवाला दिया गया।

सरकारी पक्ष के अधिवक्ता ने बताया कि करीब डेढ़ वर्ष तक चली सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों से स्वामित्व संबंधी दस्तावेज मांगे गए थे। उनके अनुसार, मस्जिद पक्ष ऐतिहासिक रिकॉर्ड और बिजली कनेक्शन से जुड़े दस्तावेज तो प्रस्तुत कर सका, लेकिन भूमि के स्वामित्व का स्पष्ट प्रमाण नहीं दे पाया। इसी आधार पर अदालत ने अपना आदेश पारित किया।

उधर, इस मामले में शिकायत करने वाले पक्ष ने अदालत के फैसले का स्वागत करते हुए प्रशासन से जल्द कार्रवाई की मांग की है। वहीं देवबंदी उलेमा ने कहा कि मामले का जवाब कानूनी प्रक्रिया के तहत दिया जाएगा और अब उच्च न्यायालय में अपील दायर कर न्यायिक राहत मांगी जाएगी।

फिलहाल इस विवाद का अगला चरण इलाहाबाद हाईकोर्ट में होगा, जहां दोनों पक्ष अपने-अपने दस्तावेज और कानूनी दलीलें पेश करेंगे।

Check Also

1.92 लाख की साइबर ठगी से जुड़े ट्रांजेक्शन पर केस, युवक की भूमिका की जांच जारी

सहारनपुर में साइबर अपराध से जुड़े एक मामले में पुलिस ने एक युवक के खिलाफ …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *