भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वरिष्ठ नेता धर्मेंद्र प्रधान लंबे समय तक पार्टी के प्रमुख चुनावी रणनीतिकारों और केंद्रीय मंत्रियों में गिने जाते रहे हैं। संगठन में मजबूत पकड़, कई राज्यों में चुनावी जिम्मेदारियां और केंद्र सरकार के महत्वपूर्ण मंत्रालयों का नेतृत्व करने वाले प्रधान का राजनीतिक सफर कई अहम पड़ावों से होकर गुजरा। हाल ही में परीक्षा प्रणाली से जुड़े विवाद और NEET पेपर लीक मामले को लेकर बढ़े विरोध प्रदर्शनों के बीच उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया, जिसके बाद उनका नाम एक बार फिर चर्चा में आ गया।
छात्र राजनीति से राष्ट्रीय नेतृत्व तक
धर्मेंद्र प्रधान ने वर्ष 1983 में छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। संगठन में सक्रिय भूमिका निभाने के बाद उन्होंने भाजपा में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं और धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर के नेता के रूप में अपनी पहचान बनाई।
चुनावी रणनीतिकार के रूप में बनाई पहचान
पार्टी ने उन्हें कई चुनौतीपूर्ण राज्यों में चुनावी जिम्मेदारियां सौंपीं। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2017, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022, बिहार और हरियाणा जैसे राज्यों में संगठन और चुनाव प्रबंधन में उनकी अहम भूमिका रही। ओडिशा में भाजपा के विस्तार में भी उन्हें प्रमुख रणनीतिकारों में माना जाता है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 में उन्हें नंदीग्राम सीट की जिम्मेदारी दी गई थी। इसी सीट से तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुनाव मैदान में थीं। राज्य में उनकी पार्टी की जीत के बावजूद नंदीग्राम सीट का परिणाम राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना था।
ओडिशा में भाजपा के विस्तार में योगदान
धर्मेंद्र प्रधान ओडिशा भाजपा के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे हैं। वर्ष 2000 में उन्होंने पल्लाहारा विधानसभा सीट से चुनावी राजनीति की शुरुआत की। बाद में देवगढ़ लोकसभा सीट से भी चुनाव लड़ा। वर्ष 2024 में ओडिशा में भाजपा की सरकार बनने के बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद की संभावनाओं से भी जोड़ा गया था।
चुनावी हार के बाद संगठन में बढ़ी जिम्मेदारी
2009 का लोकसभा चुनाव हारने के बाद उन्होंने सक्रिय चुनावी राजनीति से कुछ दूरी बनाई, लेकिन संगठन में उनकी भूमिका लगातार बढ़ती गई। वर्ष 2010 में उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया और 2012 में वे राज्यसभा सदस्य बने।
मोदी सरकार में अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी
2014 में केंद्र में सरकार बनने के बाद धर्मेंद्र प्रधान को पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली। उनके कार्यकाल में उज्ज्वला योजना शुरू हुई, जिसके तहत गरीब परिवारों को एलपीजी कनेक्शन उपलब्ध कराए गए। लंबे समय तक पेट्रोलियम मंत्रालय संभालने के बाद उन्होंने शिक्षा मंत्रालय की भी जिम्मेदारी संभाली और मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में भी इस पद पर बने रहे।
शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा
हाल के महीनों में परीक्षा प्रणाली और NEET पेपर लीक को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए। इस मुद्दे पर बढ़ते राजनीतिक और सार्वजनिक दबाव के बीच धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे को इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम माना जा रहा है।
बिहार और अन्य राज्यों में निभाई अहम भूमिका
बिहार की राजनीति में भी धर्मेंद्र प्रधान को भाजपा और सहयोगी दलों के बीच समन्वय बनाने वाले नेताओं में गिना जाता रहा है। विभिन्न राजनीतिक परिस्थितियों में पार्टी नेतृत्व ने उन्हें कई बार बातचीत और संगठनात्मक जिम्मेदारियां सौंपीं। उनकी संगठन क्षमता और चुनाव प्रबंधन की शैली ने उन्हें भाजपा के प्रमुख रणनीतिकारों में स्थान दिलाया।
धर्मेंद्र प्रधान का राजनीतिक सफर छात्र राजनीति से शुरू होकर केंद्रीय मंत्री, संगठनात्मक नेतृत्व और चुनावी रणनीतिकार तक पहुंचा। हालिया इस्तीफे के बाद भले ही उनकी भूमिका बदली हो, लेकिन भारतीय राजनीति में उनकी संगठनात्मक और चुनावी पहचान अब भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।
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