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नई रिसर्च का अलर्ट—2085 तक बड़ी संख्या में वन्यजीवों के घर प्रभावित, जलवायु परिवर्तन बनेगा बड़ा संकट

जलवायु परिवर्तन अब केवल तापमान बढ़ने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह पृथ्वी की जैव विविधता के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है। हाल ही में प्रकाशित एक नई रिसर्च के मुताबिक, अगर ग्लोबल वॉर्मिंग की रफ्तार ऐसे ही जारी रही, तो साल 2085 तक धरती पर रहने वाले एक-तिहाई से अधिक जानवरों के प्राकृतिक आवास गंभीर खतरे में पड़ सकते हैं।

यह अध्ययन प्रतिष्ठित जर्नल Nature Ecology & Evolution में प्रकाशित हुआ है। इसमें चेतावनी दी गई है कि हीटवेव, जंगल की आग, सूखा और बाढ़ जैसी चरम जलवायु घटनाएं तेजी से बढ़ेंगी, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र पर व्यापक असर पड़ेगा।

इस रिसर्च का नेतृत्व Potsdam Institute for Climate Impact Research के वैज्ञानिकों ने किया। अध्ययन में जलवायु पूर्वानुमानों के साथ-साथ प्रजातियों से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण किया गया, जिसमें IUCN Red List जैसे महत्वपूर्ण डेटा स्रोतों का उपयोग किया गया।

रिसर्च की प्रमुख वैज्ञानिक Stephanie Hennecke ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को अभी भी कम करके आंका जा रहा है, खासकर उन अचानक आने वाली चरम घटनाओं को, जो कम समय में बड़ा नुकसान पहुंचा सकती हैं। उनका कहना है कि खतरा सिर्फ धीरे-धीरे बढ़ते तापमान का नहीं, बल्कि लगातार और बार-बार आने वाली आपदाओं का भी है।

अध्ययन में 33,936 स्थलीय कशेरुकी प्रजातियों और 794 पारिस्थितिक क्षेत्रों का विश्लेषण किया गया। इसके मुताबिक, 2050 तक मध्यम-उच्च उत्सर्जन की स्थिति में प्रजातियों के मौजूदा आवास का करीब 74% हिस्सा हीटवेव से प्रभावित हो सकता है। इसके अलावा 16% क्षेत्र जंगल की आग, 8% सूखे और 3% बाढ़ के जोखिम में रहेगा।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि जब कई चरम घटनाएं एक के बाद एक होती हैं, तो उनका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। उदाहरण के तौर पर 2019–2020 Australian bushfires से पहले पड़े सूखे ने वहां की वनस्पति और जीव-जंतुओं को और अधिक नुकसान पहुंचाया, जिससे प्रजातियों में गिरावट 27 से 40 प्रतिशत तक ज्यादा दर्ज की गई।

सबसे अधिक खतरा उन क्षेत्रों को है जहां जैव विविधता बहुत अधिक है, जैसे Amazon Basin, अफ्रीका, भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया। यानी जहां सबसे ज्यादा प्रजातियां मौजूद हैं, वहीं जलवायु संकट का असर भी सबसे ज्यादा देखने को मिल सकता है।

अध्ययन के अनुसार, 2050 तक 22 ऐसे पारिस्थितिक क्षेत्र होंगे जहां आधे से ज्यादा हिस्से पर दो या उससे अधिक चरम घटनाओं का खतरा होगा। यह संख्या 2085 तक बढ़कर 236 तक पहुंच सकती है। अंतिम निष्कर्ष और भी गंभीर है—2085 तक करीब 36% आवास ऐसे होंगे जहां कई तरह की चरम मौसमीय घटनाएं एक साथ प्रभाव डालेंगी।

हालांकि, वैज्ञानिकों ने उम्मीद भी जताई है कि अगर ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को तेजी से घटाकर ‘नेट जीरो’ लक्ष्य हासिल किया जाए, तो इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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