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ममता कालिया का सम्मान—साहित्य अकादमी पुरस्कार 2026 मिला, बोलीं—इलाहाबाद मेरी पहचान

भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने वर्ष 2026 के साहित्य अकादमी पुरस्कारों की घोषणा करते हुए प्रसिद्ध लेखिका ममता कालिया को उनके संस्मरण ‘जीते जी इलाहाबाद’ के लिए सम्मानित करने का निर्णय लिया है। इस उपलब्धि पर उन्होंने गहरी खुशी जाहिर की और इसे संस्मरण विधा के लिए भी एक महत्वपूर्ण क्षण बताया।

पुरस्कार मिलने के बाद ममता कालिया ने कहा कि उन्हें इस बात की विशेष प्रसन्नता है कि इस बार संस्मरण जैसी विधा को भी साहित्य अकादमी ने मान्यता दी है। उन्होंने बताया कि इस पुस्तक को लिखना उनके लिए एक बेहद भावनात्मक और आनंददायक अनुभव रहा। लेखन के दौरान वे जैसे अपने प्रिय शहर की गलियों, सड़कों और माहौल में फिर से जी उठी थीं।

उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति किसी शहर में लंबे समय—करीब 30 वर्षों तक—रहता है, तो वह शहर उसकी पहचान का हिस्सा बन जाता है। ‘जीते जी इलाहाबाद’ में उन्होंने उसी अपनत्व को शब्दों में पिरोने की कोशिश की है। किताब में शहर की गलियां, वहां की सड़कों की धूल, दोस्ती, शरारतें और जीवन की हलचल को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया गया है।

ममता कालिया ने बताया कि इस पुस्तक को लिखते समय उन्हें अपने पुराने दिनों की कई यादें ताजा हो गईं। शहर के लोग, रिश्ते और वहां का माहौल उनके मन में फिर से जाग उठा। उनके अनुसार, इलाहाबाद केवल एक शहर नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभव है, जहां लेखक जीते हैं, सांस लेते हैं और अपनी रचनात्मकता को आकार देते हैं।

इलाहाबाद के नाम बदलकर प्रयागराज किए जाने पर उन्होंने कहा कि यह शहर अपने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व के लिए हमेशा खास रहा है। यहां की प्राकृतिक सुंदरता, खासकर पतझड़ के मौसम में सड़कों पर बिखरे पत्तों की आवाज, एक अलग ही एहसास देती है।

उन्होंने शहर की उन छोटी-छोटी बातों को भी याद किया, जो उसे खास बनाती हैं—जैसे कंपनी बाग में बच्चों का पेड़ों से फल तोड़ना या शहर का साहित्यिक माहौल। उनके मुताबिक, इलाहाबाद एक ऐसा स्थान है जहां न्यायपालिका से जुड़े लोग भी साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं, जो इसे और भी विशिष्ट बनाता है।

ममता कालिया के लिए ‘जीते जी इलाहाबाद’ सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि उनके जीवन का एक भावनात्मक दस्तावेज है, जिसमें एक शहर की आत्मा बसती है।

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