मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मस्थान और शाही ईदगाह मस्जिद से जुड़ा विवाद पिछले पांच वर्षों से न्यायिक प्रक्रिया में है। यह मामला मथुरा की निचली अदालत से होते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है, लेकिन अब तक किसी अंतिम फैसले पर नहीं पहुंच सका है।
इस विवाद की शुरुआत 23 दिसंबर 2020 को हुई, जब श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास के अध्यक्ष महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट ने सिविल जज (सीनियर डिवीजन), मथुरा की अदालत में वाद दायर किया। इस मामले में ठाकुर केशव देव जी महाराज विराजमान को वादी और शाही ईदगाह मस्जिद कमेटी को प्रतिवादी बनाया गया।
वाद में दावा किया गया है कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि की कुल 13.37 एकड़ भूमि में से लगभग 2.50 एकड़ क्षेत्र पर बनी शाही ईदगाह मस्जिद मुगल काल में वर्ष 1670 में भगवान श्रीकृष्ण के मूल गर्भगृह स्थल पर निर्मित की गई थी।
हिंदू पक्ष का कहना है कि वर्ष 1968 में श्रीकृष्ण जन्मभूमि सेवा संस्थान और शाही ईदगाह मस्जिद कमेटी के बीच हुआ समझौता अवैध है। उनका तर्क है कि संबंधित भूमि के राजस्व रिकॉर्ड श्रीकृष्ण जन्मभूमि सेवा ट्रस्ट के नाम दर्ज हैं और खसरा संख्या 825 व खेवट संख्या 255 में मस्जिद का कोई उल्लेख नहीं मिलता।
शाही ईदगाह मस्जिद कमेटी की ओर से इस मुकदमे को उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 के तहत अस्वीकार्य बताते हुए आपत्ति दर्ज की गई थी। हालांकि, अदालत ने लंबी सुनवाई के बाद इस आपत्ति को खारिज कर वाद को सुनवाई योग्य माना। इसके बाद इससे जुड़े कई अन्य मुकदमे भी अदालत में दाखिल किए गए।
हिंदू पक्ष का दावा है कि मस्जिद परिसर में हिंदू धार्मिक प्रतीकों के प्रमाण मौजूद हैं। इसके समर्थन में उन्होंने ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं। उनका कहना है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व महानिदेशक एलेक्जेंडर कनिंघम की 1862 से 1865 के बीच की रिपोर्टों में मस्जिद के स्तंभों पर हिंदू प्रतीकों का उल्लेख मिलता है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा कोर्ट कमीशन से सर्वे के आदेश दिए गए थे, लेकिन शाही ईदगाह मस्जिद कमेटी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल सर्वे प्रक्रिया पर रोक लगा दी है। इसके बावजूद मुकदमे की सुनवाई जारी है।
मामले की अगली सुनवाई 30 जनवरी को प्रस्तावित है, जिसमें वाद से जुड़े महत्वपूर्ण बिंदुओं को तय किया जाना है। हिंदू पक्ष की ओर से कोर्ट कमीशन, एएसआई सर्वे और ढांचे को विवादित घोषित करने से जुड़े आवेदन हाईकोर्ट में अभी लंबित हैं।
इस विवाद को लेकर हिंदू पक्ष का कहना है कि यह मामला केवल जमीन का नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और अस्तित्व से जुड़ा हुआ है, जिसकी न्यायिक रूप से स्पष्टता आवश्यक है।
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