प्रयागराज माघ मेले में मौनी अमावस्या के दिन शुरू हुआ शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और पुलिस-प्रशासन के बीच टकराव लगातार दस दिनों तक चर्चा में रहा। संगम स्नान से रोके जाने की घटना ने ऐसा तूल पकड़ा कि यह मामला धार्मिक आस्था, प्रशासनिक व्यवस्था और राजनीति के बीच टकराव का प्रतीक बन गया। अंततः 28 जनवरी को शंकराचार्य के मेला क्षेत्र से प्रस्थान के साथ यह विवाद समाप्त हुआ।
मौनी अमावस्या पर शुरू हुआ विवाद
18 जनवरी को मौनी अमावस्या के अवसर पर शंकराचार्य पालकी में सवार होकर संगम स्नान के लिए जा रहे थे। इसी दौरान भीड़ अधिक होने का हवाला देते हुए पुलिस ने उन्हें संगम से कुछ दूरी पहले ही रोक दिया। इस कदम से मौके पर तनाव की स्थिति बन गई और संत समाज में नाराजगी फैल गई।
शिष्यों के साथ मारपीट और अपमान के आरोप
शंकराचार्य ने आरोप लगाया कि घटना के बाद उनके कुछ शिष्यों को संगम नोज चौकी ले जाकर पुलिसकर्मियों ने पीटा। साथ ही यह भी कहा गया कि उनकी पालकी को सम्मान के बजाय अपमानजनक तरीके से शिविर के बाहर छोड़ दिया गया, जिससे संत समाज आहत हुआ।
शिविर में प्रवेश से इनकार, बाहर बैठकर विरोध
घटना के बाद शंकराचार्य ने ऐलान किया कि जब तक प्रशासन उन्हें सम्मानपूर्वक संगम स्नान नहीं कराता, तब तक वह अपने शिविर में प्रवेश नहीं करेंगे। इसके बाद वे लगातार अपने शिविर के बाहर ही बैठे रहे और प्रशासन के खिलाफ विरोध दर्ज कराते रहे।
गो प्रतिष्ठा प्रेरणा यात्रा बनी आंदोलन का हिस्सा
विवाद के दौरान शंकराचार्य प्रतिदिन सुबह पूजन और तर्पण के बाद ‘गो प्रतिष्ठा प्रेरणा यात्रा’ पर निकलते रहे। माघ मेला क्षेत्र में मौजूद संत-महात्माओं से मुलाकात कर वे गोरक्षा और धार्मिक चेतना का संदेश देते रहे।
सोशल मीडिया से राजनीति तक गूंजा मामला
यह विवाद सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। देशभर में इसे लेकर समर्थन और विरोध में बहस शुरू हो गई। कुछ लोगों ने इसे संतों के सम्मान से जोड़कर देखा, जबकि कुछ ने सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण को प्राथमिकता बताते हुए प्रशासन का पक्ष लिया।
विपक्ष का सरकार पर हमला
मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया। कई विपक्षी नेताओं ने शंकराचार्य से मुलाकात कर सरकार और प्रशासन पर संतों के अपमान का आरोप लगाया। इसे लेकर बयानबाजी और प्रदर्शन भी देखने को मिले।
नोटिस और जवाबी प्रेस कॉन्फ्रेंस
विवाद के बीच मेला प्रशासन ने शंकराचार्य को दो नोटिस जारी किए। नोटिस में ‘शंकराचार्य’ नाम के उपयोग को लेकर सवाल उठाए गए। इसके जवाब में शंकराचार्य ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की गलत व्याख्या की जा रही है और वह अपने नाम के साथ शंकराचार्य लिखने के अधिकार रखते हैं।
समर्थन और विरोध का सिलसिला
जहां संत समाज के एक बड़े वर्ग ने शंकराचार्य का समर्थन किया, वहीं कुछ लोगों ने प्रशासनिक कार्रवाई को सही ठहराया। इस तरह यह मामला धार्मिक, प्रशासनिक और राजनीतिक बहस के केंद्र में बना रहा।
11वें दिन मेला क्षेत्र से प्रस्थान
लगातार दस दिनों तक शिविर के बाहर बैठने के बाद 11वें दिन यानी 28 जनवरी को शंकराचार्य माघ मेला क्षेत्र से रवाना हो गए। प्रस्थान से पहले उन्होंने कहा कि वह भारी मन से मेला छोड़ रहे हैं। उनके जाने के साथ ही यह विवाद समाप्त हो गया, लेकिन माघ मेले में हुआ यह संत-प्रशासन टकराव लंबे समय तक चर्चा में बना रहेगा।
Aaina Express