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सियासी विश्लेषण: राहुल और प्रियंका की पसंद हैं, लेकिन अलीगढ़ सीट की हार नापसंद है

 

 

रविवार की छुट्टी के दिन अलसाये शहर में सुबह-सबेरे राहुल-प्रियंका की भारत जोड़ो न्याय यात्रा में जुटी भीड़ ने यह तो साबित कर दिया कि बड़ी संख्या में लोग उन्हें पसंद करते हैं। राहुल और प्रियंका के आम लोगों से घुलने-मिलने का अंदाज भी आम लोगों को भाता है। लेकिन स्थानीय कांग्रेसी अलीगढ़ की प्रतिष्ठापूर्ण संसदीय सीट को गठबंधन धर्म पर कुर्बान करने से बहुत खुश नहीं हैं। खास तौर पर उस परिस्थिति में जब पार्टी में एक से ज्यादा काबिल दावेदार थे। दबी जुबान में स्थानीय कांग्रेसियों का यह भी कहना है कि अलीगढ़ में मौजूदा समय में सपा का सर्वसम्मत कोई कद्दावर चेहरा ऐसा नहीं है जिस पर गठबंधन दांव लगा सके।

सियासी पंडितों का मानना है कि राहुल-प्रियंका के प्रति लोगों में खासा आकर्षण है। लेकिन पार्टी ने अपनी संगठनात्मक कमजोरी और काबिल उम्मीदवारों की कमी की वजह से व्यावहारिक सोच दिखाते हुए यूपी में कम सीटों पर समझौता कर लिया है। अलीगढ़ सीट का चुनावी इतिहास भी इस बात की तस्दीक करता है कि कांग्रेस की स्थिति चुनाव दर चुनाव कमजोर होती गई। 2014 के चुनाव में कांग्रेसी उम्मीदवार चौधरी बिजेंद्र सिंह को सिर्फ 62674 वोट मिले थे।

 

 

2019 के चुनाव में उन्हें 50880 मत ही मिल पाए थे। 2014 में सपा उम्मीदवार जफर आलम को 228284 वोट मिले थे तो बसपा उम्मीदवार अरविंद सिंह को 227886 वोट मिले थे। 2019 में बसपा-सपा गठबंधन के उम्मीदवार अजीत बालियान को 4.50 लाख से ज्यादा वोट मिले थे। लेकिन इस बार बसपा अलग लड़ेगी। लेकिन स्थानीय कांग्रेसियों का मानना है कि इस बार अलीगढ़ में ऐसी स्थिति नहीं थी। इस बार अलग कांग्रेस सही उम्मीदवार को टिकट देती तो उसे ठीकठाक वोट मिल सकते थे। राहुल की यात्रा में इसी लिए सपाई भी बड़ी संख्या में दिखे क्योंकि रविवार को ही सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव को न्याय यात्रा में शामिल होना था। कई सपाई तो राहुल की यात्रा के साथ-साथ अलीगढ़ से आगरा तक भी गए।

उम्मीद: बदल सकता है फैसला, कांग्रेस को मिल सकती है सीट

 

चूंकि सपा ने अलीगढ़ संसदीय सीट पर बेशक लड़ने का फैसला किया है लेकिन कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ लोगों को अभी भी उम्मीद है कि सपा कांग्रेस के पक्ष में यह सीट छोड़ भी सकती है। इस संबंध में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सपा आलाकमान से संपर्क भी साधे हुए हैं। कांग्रेसियों का तर्क है कि पार्टी के पास एक से ज्यादा काबिल दावेदार हैं जो भाजपा को अच्छी टक्कर दे सकते हैं। ऐसे उम्मीदवारों ने पूरे पांच साल तक अलीगढ़ में सक्रिय रहकर जमीन तैयार की है। उनकी छवि भी अच्छी है। लोकप्रियता के पैमाने पर भी वह किसी भी अन्य पार्टी के उम्मीदवार से कम नहीं हैं। सूत्रों का कहना है जिले के कुछ कांग्रेसियों को ऐसे संकेत भी मिले हैं कि वह धैर्य रखकर प्रतीक्षा करें। गठबंधन के हित में दोनों दलों का आलाकमान बेहतर फैसला लेगा। ऐसे में बेहतर उम्मीदवारी के लिए यहां से कांग्रेस का उम्मीदवार भी उतारा जा सकता है।

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